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सिर्फ़ भाग लेने से ही हमेशा अधिकारिकरण नही पैदा होता. इसके लिये एक सहयोगी वातावरण चाहिये जिसमें लोगों की इच्छायों और कुशलतायों को बढ़ावा मिले जिससे उनका सामर्थ्य बढ़ॆ और जिससे खुद ही अधिकारिकरण उत्पन्न हो. ऐसा करने के लिए कुछ तरीके हैं:
इस क्रिया में अवसर होने चाहिये चिन्तन के लिये और स्वयं-समीक्षा के लिये;
... भाग लेने के लिये १० मुख्य सूत्र. ... १. भाग लेने की सीमायें. .... शेरी आर्नस्टिन (१९६९) ने किसी भी क्रिया में भाग लेने की सीढी में ८ पायदान बताये. संक्षेप में यह हैं: १ जुगाड़ और 2 उपचार. यह सम्मलन (भागीदारी) की क्रिया नही है. यहां लक्ष्य सिर्फ़ ञान देना या उपचार करना है. इसमे माना जाता है कि जो योजना प्रस्तुत की जाय वही सबसे अच्छी है और लोगों को शामिल करने का लक्ष्य सिर्फ़ उनकी हामी लेने के लिये है. ३ जानकारी देना. भागीदारी के लिये यह बहुत ही महत्वपूर्ण पहला कदम है. पर कई बार यह सिर्फ़ एक तर्फ़ा वक्तव्य हो जाता है. कोई सुझाव पाने का द्वार नही होता. ४ सलह लेना. सामुहिक तौर पर बैठकों का संयोजन करना, या लोगों से पूछना आदि.किन्तु अक्सर यह दिखावा भर बन जाता है ५. सांत्वना देना. कुछ चुने हुए व्यक्तियों को समिति में ले लेना. ६. साझेदारी. यहां शक्ति एक जगह केन्द्रित नही रहती, किन्तु चर्चा के बाद लोगों में बंट जाती है. योजना बनाने का काम और निर्णय लेने का काम अलग अलग लोगों को सौंपा जाता है ७ शक्ति का प्रतिनिधित्व. समाज द्वारा चुने गये लोग समिति में होते हैं और उन्हॆं समाज द्वारा शक्ति दी जाती है. उनकी ज़िम्मेदारी अब समाज की ओर होती है सभी योजनायों के लिये. ८ नागरिक नियन्त्रण. सारा कार्य स्वयं नागरिकों द्वारा किया जाता है-योजना बनाना, दिशा निश्चित करना,और योजना का नियन्त्रण. ... २. शुरुआत और क्रिया .... लोग खुद-ब-खुद ही नही भाग लेते, कोई शुरुआत करता है. फिर कोई इस क्रिया को आगे बढ़ाता है और धीरे धीरे दूसरों को भी अवसर देता है कि उनके कार्यों से फल पर प्रभाव हो. इस क्रिया का विस्तार से विवरण ४ भागों में किया गया है: शुरुआत - तैय्यारी - भाग लेना - जारी रखना. ... ३. नियन्त्रण .... शुरुआत करने वाला यह निश्चित करने की अच्छी स्थिति में होता है कि कितना नियन्त्रण होना चाहिये. यह निर्णय ऐसा ही है जैसे निश्चित करना कि सीढी की कौन सी पायदान पर हम होंगे -- या हम किस सीमा तक कार्यों में शामिल होंगे. ... ४. लक्ष्य और प्रभाव .... भागीदारी या सम्मलन के महत्व को समझना ऐसा ही है जैसे शक्ति को समझना:अलग अलग द्रिष्टिकोण वाले दलों का अपने लक्ष्य को पाने की क्षमता. ताकत उसके पास होती है जिसके पास जानकारी हो, धन हो. यह लोगों के भरोसे और कुशलतायों पर भी निर्भर है. बहुत सी ऐसी संस्थायें होती हैं जो लोगों को भाग नही लेने देती क्यों कि उन्हें डर होता है कि उनका प्रभाव कम हो जायेगा. पर बहुत ऐसे अवसर आते हैं जहां लोगों के सम्मिलित रूप से कार्य करने से नतीजा एक अकेले व्यक्ति के प्रयास से कई गुणा बेहतर होता है. यही मिल कर काम करने का सबसे बढ़ा लाभ है. ... ५. सहायक की भूमिका .... सहायकों का प्रभाव बहुत होता है. यह ज़रूरी है कि वह लगातार अपनी भूमिका के बारे में सोचें ... ६. समाज और कार्यकर्ता .... यहां कार्यकर्ता से हमारा तात्पर्य है किसी भी ऐसे व्यक्ति से जिसको जो हो रहा है उसमें रुचि हो. किस योजना से किस पर प्रभाव पडे़गा, किस के पास धन, कुशलता, या जानकारी है, कौन सहायक हो सकता है, कौन बाधा डाल सकता है. सभी लोगों का बराबर प्रभाव नही होता. सीढ़ी के उदाहरण से सोचिये कि कौन कम प्रभावशाली है और कौन अधिक. ... समाज का कौन सा वर्ग किस योजना में सम्मिलित होता है निर्भर होगा अलग अलग वर्गों की रुचियों पर ... ७. साझेदारी. .... जब अलग अलग रुचि वाले लोग अपने आप ही किसी सार्वजनिक लक्ष्य के लिये मिल कर कार्य करते हैं तो साझेदारी बहुत उपयोगी साबित होती है. ज़रूरी नही कि सभी में बराबर की क्षमतायें, धन, या विश्वास हो, पर यह ज़रूरी है कि आपस में भरोसा हो और एक सी लगन हो. भरोसा और लगन उत्पन्न करने में समय लगता है. ... ८. लगन .... लगन उदासीनता का विपरीत रूप है: जिनमे लगन होती है वह लोग कुछ करना चाहते हैं, उदासीन लोग नही.पर लगन कैसे पैदा की जाये? सिर्फ़ ऐसी बातों से नहीं जैसे "तुम्हें परवाह होनी चाहिये,"या उन्हें सामुहिक बैठकों में बुलाना या आकर्शक पर्चे देना. लोग उन विषयों की परवाह करते हैं जिनमे उनकी रुचि हो, और तब लगन उत्पन्न होती है जब उन्हे लगता है कि वह कुछ कर सकते हैं. जोर जबर्दस्ती से यह नही हो सकता. अगर लोग आपकी योजनायों के प्रति उदासीन हैं तो इसका सिर्फ़ यह अर्थ है कि उनकी आपकी योजनायों में रुचि नही है. ... ९. विचारों को अपनाना .... लोगों में लगन से कार्य करने की संभावना तब होती है जब उसमें वह कुछ फायदा देखते हैं, या जब वह कह सकते हैं"यह हमारा इरादा था." इसको सच्चाई में उतारने के लिये आपको वर्क-शौप्स करनी होंगी जहां विचारों का खुले रूप से आदान-प्रदान हो, जहां लोग विचारों की व्यवहारिकता पर गौर करें, और अन्त में पूरी चर्चा के बाद एक ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचें जो अत्यधिक लोगों की सहमति से हो. जितना लोगों को किसी कार्य में लाभ नज़र आयेगा उतनी उदासीनता कम होगी. ... १०. भरोसा और क्षमता .... इरादों को सच्चाई में उतारना निर्भर करता है लोगों के भरोसे और क्षमता पर. भागीदारी की क्रियायों में ऐसे अवसर भी आते हैं जब बिल्कुल नई दिशायों में जाना पढ़्ता है. ऐसा सोचना भूल होगी कि अचानक ही लोगों में जटिल और उलझी हुई समस्यायों का हल निकालने की क्षमता आ जायेगी. उन्हें शिक्षण चाहिये, और अवसर चाहिये सीखने के लिये.अपने पर भरोसे के लिये, एक दूसरे पर विश्वास के लिये. |
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देखिये समाज को अपनाना |
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